Monday, August 24, 2015

भारतीय नोटों से जुड़ी कई जानकारी,इनके बारे में कम ही लोग जानते हैं

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FROM DAINIK BHASKAR DOT COM



भारत में रहने वाला हर शख्स भारतीय नोटों से जुड़ी कई जानकारी रखता है। फिर भी करंसी के बारे में कुछ बातें ऐसी हैं जो कम ही लोग जानते हैं। इनमें नोटों में छपे चित्र, अंक और तस्करी जैसे जुड़े फैक्ट्स हैं। मनी भास्कर आपको भारतीय नोट से जुड़ी कुछ ऐसी ही जानकारियां दे रहा है, जिनमें बहुत कुछ छुपा होता है, लेकिन इनके बारे में कम ही लोग जानते हैं।
1. हर नोट पर होती है एक खास तस्वीर
हर भारतीय नोट पर इंसानों, जानवरों, प्रकृति से लेकर आजादी के आंदोल से जुड़ी तस्वीरें छपी होती है। 20 रुपए के नोट पर अंडमान आइलैंड की तस्वीर है। वहीं, 10 रुपए के नोट पर हाथी, गैंडा और शेर छपा हुआ है, जबकि 100 रुपए के नोट पर पहाड़ और बादल की तस्वीर है। इसके अलावा 500 रुपए के नोट पर आजादी के आंदोलन से जुड़ी 11 मूर्ति की तस्वीर छपी है।
2. फटा नोट नहीं होता बेकार
अगर आपके पास फटा और 51 फीसदी से ज्यादा फटा नोट है, तो आप उसको बैंक में जाकर बदल सकते है। आरबीआई की गाइडलाइन्स के अनुसार, किसी भी प्रकार का फटा, पुराना और गंदा नोट किसी भी बैंक की शाखा में जाकर बदला जा सकता है। गाइडलाइन्स के अनुसार, अगर आपका नोट आधे से भी ज्यादा फटा है तो भी आप बैंक में जाकर नया ले सकते है।

3. ब्लेड बनाने के लिए होती थी सिक्कों की तस्करी
बांग्लादेश में ब्लेड बनाने के लिए एक समय 5 रुपए के सिक्कों की तस्करी की जाती थी। पांच रुपए के एक सिक्के से 6 ब्लेड बनाया जाता था। एक ब्लेड की कीमत 2 रुपए थी। ऐसे में ब्लेड बनाने वालों को खासा फायदा होता था। इसको देखते हुए सरकार ने सिक्का बनाने में इस्तेमाल होने वाले मेटल को बदल दिया। 2009 में पुलिस ने सिक्कों की खेप को पकड़ा था, जिसके बाद इसकी जानकारी मिली थी।

4. कभी एक रुपए में मिलता था 13 डॉलर
शुक्रवार को एक डॉलर की कीमत 65.83 रुपए पहुंच गई, जो 2 साल का निचला स्तर है। विदेशी फंड्स की बिकवाली से रुपए पर दबाव दिख रहा है और रुपए में गिरावट थमती नहीं दिख रही है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब रुपए की कीमत डॉलर से ज्यादा थी। 1917 में एक रुपए की कीमत 13 अमेरिकी डॉलर थी।

5. भारतीय नोट पर 17 भाषाओं में लिखी होती है कीमत
हिंदी और अंग्रेजी के अलावा भारतीय नोट में 15 भाषाओं का इस्तेमाल होता है। कोई भी नोट जैसे 10, 20, 50 पर हिंदी और अंग्रेजी के साथ असमी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु और उर्दू में उसकी कीमत लिखी होती है। हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल नोट के अगले हिस्से में होता है। बाकी भाषाएं नोट के पिछले हिस्से पर लिखी होती हैं।

6. निशान से पता चलता है कहां ढला है सिक्का
हर सिक्के पर एक निशान छपा होता है जिसको देखकर आपको पता चल जाएगा कि यह किस मिंट का है। सिक्के में छपी तारीख के नीचे एक डायमंड टूटा नजर आ रहा है। ये चिह्न हैदराबाद मिंट का चिह्न है। हैदराबाद मिंट की शुरुआत में स्टार मार्क का इस्तेमाल किया गया। बाद में इसे बदलकर डायमंड शेप में लाया गया और उनमें से कुछ सिक्के में टूटा डायमंड भी शामिल है। नोएडा मिंट के सिक्कों पर जहां छपाई का वर्ष अंकित किया गया है उसके ठीक नीचे छोटा और ठोस डॉट होता है। इसे सबसे पहले 50 पैसे के सिक्के पर बनाया गया था। 1986 में इन सिक्कों पर ये मार्क अंकित किया जाना शुरू हुआ था। इसके अलावा मुंबई और कोलकाता में मिंट है।

7. 1954 में छापे गए थे 10,000 और 5,000 रुपए का नोट
1938 में पहली बार रिजर्व बैंक ने 10,000 रुपए का नोट भारत में छापा था। रिजर्व बैंक ने जनवरी 1938 में पहली पेपर करंसी छापी थी, जो 5 रुपए नोट की थी। इसी साल 10 रुपए, 100 रुपए, 1,000 रुपए और 10,000 रुपए के नोट भी छापे गए थे। हालांकि, 1946 में 1,000 और 10 हजार के नोट बंद कर दिए गए थे। लेकिन 1954 में एक बार फिर से 1,000 और 10,000 रुपए के नोट छापे गए। साथ ही 5,000 रुपए के नोट की भी छपाई की गई। लेकिन, 1978 में 10,000 और 5,000 के नोट को पूरी तरह से बंद कर दिया गया।

8. आरबीआई नहीं वित्त मंत्रालय जारी करता है एक रुपए का नोट
एक रुपए का नोट वित्त मंत्रालय जारी करता है। बाकी सभी नोट जारी करने का अधिकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के पास है। इस नोट पर आरबीआई गवर्नर की जगह फाइनेंस सेक्रेटरी का सिग्नेचर होता है।
9. भारत ही नहीं इन देशों की करंसी भी है रुपया
20 शताब्दी के शुरुआत में रुपया अदन, ओमान, कुवैत, बहरीन, कतर, केन्या, युगांडा, सेशल्स और मॉरीशस की भी करंसी थी। हालांकि, अभी भी सात ऐसे देश है जहां रुपया उनकी करंसी है। इंडोनेशिया, मॉरीशस, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका में रुपया ही चलता है।

10 .नेपाल में नहीं चलता 500 और 1000 रुपए का नोट
नकली नोट की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए नेपाल ने भारतीय 500 और 1000 रुपए के नोट पर प्रतिबंध लगा रखा है। इतना ही नहीं अगर इन नोट के साथ नेपाल में कोई पकड़ा जाता है तो उसे दंडित करने का भी प्रावधान है। इसे लेकर भारत और नेपाल के सोनौली बॉर्डर पर एक नोटिस बोर्ड भी लगाया गया है, जिसमें ये चेतावनी दी गई है।

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Monday, August 17, 2015

नागपंचमी - 19 अगस्त 2015

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पाठकों के लाभार्थ यह आलेख हिन्दी के प्रसिध्द समाचार पत्र "वेब दुनिया" से साभार  लिया गया है. 

फोटो- विभिन्न वेब-साइट से 
नागपंचमी मनाने के संबंध में एक मत यह भी है कि अभिमन्यु के बेटे राजा परीक्षित ने तपस्या में लीन ऋषि के गले में मृत डाल दिया था। इस पर ऋषि के शिष्य श्रृंगी ऋषि ने क्रोधित होकर शाप दिया कि यही सर्प सात दिनों के पश्चात तुम्हे जीवित होकर डस लेगा,ठीक सात दिनों के पश्चात उसी तक्षक सर्प ने जीवित होकर राजा को डसा। तब क्रोधित होकर राजा परीक्षित के बेटे जन्मजय ने विशाल "सर्प यज्ञ" किया जिसमे सर्पो की आहुतियां दी।  

इस यज्ञ को रुकवाने हेतु महर्षि आस्तिक आगे आए। उनका आगे आने का  कारण यह था कि महर्षि आस्तिक के पिता आर्य और माता नागवंशी थी। इसी नाते से वे यज्ञ होते देख न देख सके।सर्प यज्ञ रुकवाने,लड़ाई को ख़त्म करने पुनः अच्छे सबंधों को बनाने हेतु आर्यो ने स्मृति स्वरूप अपने त्योहारों में 'सर्प पूजा' को एक त्योहार के रूप में मनाने की शुरुआत की। 
 
फोटो- विभिन्न वेब-साइट से 
नागवंश से ताल्लुक रखने पर उसे नागपंचमी कहा जाने लगा होगा। मास्को के लेखक ग्री म वागर्द लोविन ने प्राचीन 'भारत का इतिहास' में नाग राजवंशों के बारे में बताया कि मगध के प्रभुत्व के सुधार करने के लिए अजातशत्रु का उत्तराअधिकारी उदय (461-ईपू )राजधानी को राजगृह से पाटलीपुत्र ले गया,जो प्राचीन भारत प्रमुख बन गया। अवंति शक्ति को बाद में राजा शिशुनाग के राज्यकाल में ध्वस्त किया गया था। एक अन्य राज शिशुनाग वंश का था। शिशु नाग वंश का स्थान नंद वंश (345 ईपू)ने लिया।  
भाव शतक में इसे धाराधीश बताया गया है अर्थात नागों का वंश राज्य उस समय धरा नगरी(वर्तमान में धार) तक विस्तृत था। धाराधीश मुंज के अनुज और राजा भोज के पिता सिन्धुराज या सिंधुज ने विध्याटवी के नागवंशीय राजा शंखपाल की कन्या शशिप्रभा से विवाह किया था। इस कथानक पर परमारकालीन राज कवि परिमल पदमगुप्त ने नवसाहसांक चरित्र ग्रंथ की रचना की। मुंज का राज्यकाल 10 वीं शती ईपु का है। अतः इस काल तक नागों का विंध्य क्षेत्र में अस्तित्व था। 

नागवंश के अंतिम राजा गणपतिनाग थे। इसके बाद नाग वंश की जानकारी का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। नाग जनजाति का नर्मदा घाटी में निवास स्थान होना बताया गया है। लगभग 1200  ईपु हैहय ने नागों को वहां से उखाड़ फेंका था।कुषान साम्राज्य के पतन के बाद नागों का पुनरोदय हुआ और यह नव नाग कहलाए। 
 
इनका राज्य मथुरा,विदिशा,कांतिपुरी,(कुतवार )व् पदमावती (पवैया )तक विस्तृत था। नागों ने अपने शासन काल के दौरान जो सिक्के चलाए थे उसमे के चित्र अंकित थे। इससे भी यह तथ्य प्रमाणित होता है कि नागवंशीय राजा सर्प पूजक थे। शायद इसी पूजा की प्रथा को निरंतर रखने हेतु श्रावण शुक्ल की पंचमी को नागपंचमी का चलन रखा गया होगा। कुछ लोग नागदा नामक ग्रामों को नागदा से भी जोड़ते है। यहां नाग-नागिन की प्रतिमाएं और चबूतरे बने हुए हैं  इन्हे भिलट बाबा के नाम से भी पुकारा है। 
 
उज्जैन में नागचंद्रेश्वर का मंदिर नागपंचमी के दिन खुलता है व सर्प उद्यान भी है। 
 
खरगोन में नागलवाड़ी क्षेत्र में नागपंचमी के दिन मेला व बड़ा भंडारा होता है।स र्प कृषि मित्र है व सर्प दूध नहीं पीते हैं,उनकी पूजा करना व रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।   
जिस जातक की जन्मपत्रिका में कालसर्प योग होता है उसका जीवन अत्यंत कष्टदायी होता है। इस योग से पीड़‍ित जातक मन ही मन घुटता रहता है। उसका जीवन कुंठा से भर जाता है। जीवन में उसे अनेक प्रकार की परेशानियां उठानी पड़ती हैं। ऐसे जातक को श्री सर्प सूक्त का पाठ राहत देता है। 
 
ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमा:।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।1।।
 
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासु‍कि प्रमुखाद्य:।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।2।।
 
कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।3।।
 
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखाद्य।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।4।।
 
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।5।।
 
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखाद्य।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।6।।
 
पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।7।।
 
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।8।।
 
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।9।।
 
समुद्रतीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिन:।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।10।।
 
रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
 
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।11।।

नागपंचमी के दिन क्या करें :
* इस दिन का दर्शन अवश्य करना चाहिए।
* बांबी (नागदेव का निवास स्थान) की पूजा करना चाहिए।
 नागदेव को दूध नहीं पिलाना चाहिए। उन पर दूध चढ़ा सकते हैं।
* नागदेव की सुगंधित पुष्प व चंदन से ही पूजा करनी चाहिए, क्योंकि नागदेव को सुगंध प्रिय है।
* 'ॐ कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा' का जाप करने से सर्प विष दूर होता है।
नाग पूजन कैसे करें :- 
* प्रातः उठकर घर की सफाई कर नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएं।
* तपश्चात स्नान कर साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* पूजन के लिए सिवइयां-चावल आदि का ताजा भोजन बनाएं। 
* दीवार पर गेरू पोत कर पूजन का स्थान तैयार करें। 
* फिर कच्चे दूध में कोयला घिसकर उससे गेरू पुती दीवार पर घर जैसा बनाते हैं और उसमें अनेक नाग देवों की आकृति बनाते हैं।
* कुछ जगहों पर सोने, चांदी, काठ व मिट्टी की कलम तथा हल्दी व चंदन की स्याही से अथवा गोबर से घर के मुख्य दरवाजे के दोनों बगलों में पांच फन वाले नागदेव अंकित कर पूजते हैं।
* सर्वप्रथम नागों की बांबी में एक कटोरी दूध चढ़ा आते हैं।
* फिर दीवार पर बनाए गए नागदेवता की दूध, दूर्वा, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, जल, कच्चा दूध, रोली और चावल आदि से पूजन कर सिवइयां व मिष्ठान का भोग लगाते हैं।
* तपश्चात कथा श्रवण करके नाग देवता की आरती करना चाहिए।

नाग पूजन कब और कैसे :- 
* कहीं-कहीं श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की पंचमी को भी नागपंचमी मनाई जाती है। 
* इस दिन पूजा में सफेद कमल का फूल रखा जाता है। 
* कुछ भागों में नागपंचमी से एक दिन भोजन बना कर रख लिया जाता है और नागपंचमी के दिन बासी खाना खाया जाता है।
फोटो- विभिन्न वेब-साइट से